अछूत चापाकल

 



चापाकल , यह शब्द हिंदी में पहली बार सुना, बंगाली में एक यही शब्द इस नल के लिए है। कल यानी नल, और चाप यानी दबाव, जल निकलने के लिए दबाना पड़ता है, इसीलिए बंगाली में इसे चापाकल कहते है। वैसे इसको टिपकल भी कहा जाता है, टिप यानी दबाना।

कहानी है सत्तर के दशक की, और एक भूतपूर्व जमीदार के घर के चापाकल की।

रांची से करीब १०० किलोमीटर दूर एक गांव में जाकर रुकने का शौक हुआ था। अपने दोस्त के साथ उसके गांव गए। बड़ी हवेली, हर तरफ पेड़, दो तालाब, खेती, और कुछ और छोटी फैक्ट्री। बिजली थोड़ी बहुत आती थी, पानी के लिए तलब या चापाकल। बड़ा मकान था, घर के भी लोग थे और बाहर के भी आते थे, जिसमे मजदूर भी थे और गांव के अन्य लोग भी। घर के दो चापाकल और बाहर के लोगो के लिए एक। मुझे पता नहीं लगा कि मजदूर आदि के लिए अलग चापाकल है। घर के लोगो के लिए जो दो थे वो इसलिए की अगर एक खराब हो तो दूसरा भी है।

अगले दिन पता चला कि एक खराब हो गया और सुबह ही दो जने गए उसको ठीक करने। हम लोग अहाते में बैठ कर बातें कर रहे थे। एक कोने में चारपाई पर बैठे दोस्त की दादी माला फेरते हुए जाप कर रही थी। चापाकल में उन लोगो का काम हो गया था। जिन्होंने इस ट्यूबवेल या बरमे, जैसा की उत्तर भारत में कई जगह जाना जाता है, का इस्तेमाल किया है उनको पता होगा कि ठीक करने के बाद ऊपर से पानी डाल कर चेक किया जाता है। अहाते के एक कोने में एक बाल्टी पड़ी थी। दो लोगो में से एक ने बाल्टी उठाई, साथ में ही तालाब से पानी लिया और बरमे में डाल दिया। चापाकल चल पड़ा, लेकिन एक दूसरा तूफान आ गया।

दादी ने जाप करते करते अपनी तथाकथित बंद आंखों से देख लिया बाल्टी से पानी डालते और चीख पड़ी,
"अरे मरदूदों, बेवकूफों, बेजन्मो, मांसाहारों, तुम मेरी जात बिगाड़ कर ही जलोगे क्या।"

उनके चीखने चिल्लाने से मैं तो घबरा गया, वो दोनो काम करने वाले सहम गए, जबकि मेरा दोस्त मुस्कुरा उठा और बोला, "उफ्फ, फिर कोई नाटक शुरू होगा।"

मैं बोला, "क्या हो गया? दादी अचानक क्यों और किस पर  बिफर गई?"

"संभवतः इन दोनो पर, अभी पता चलेगा।,"

"यह गंदी, मांस मछली वाली बाल्टी, इसका पानी इन लोगो ने इस बरमे में डाल दिया। अब मैं इसका पानी नहीं पिऊंगी। इसका पानी रसोई में भी नही जाएगा। इस पानी से मेरा खाना नही बनेगा।सब म्लेच्छ लोग मुझे भी म्लेच्छ बना डालेंगे, पर मैं इनका नहीं चलने दूंगी।"

उनके शोर को सुन दोस्त के पापा, चाचा, मम्मी, और भी दो चार जाने इक्कठे ही गए। समझाने की कोशिश की दो चार ने की जो पानी डाला वो तो निकल गया। पानी तो जमीन के नीचे से खींचा जा रहा है जो हर तरह से शुद्ध है। पर कौन किसकी बात सुने।

आखिर फैसला हुआ की तुरंत लोग बुलाए जाय और एक और चापाकल लगाया जाए। लोग आए, सामान आया और एक घंटे के अंदर काम शुरू हो गया। दो दिन तक दादी ने पानी नहीं पिया, और ना ही पानी से बना हुआ कोई खाना खाया। जब भी पिया तो दूध, और खाया तो दूध में चावल उबाल कर भात या खीर, दूध में आटा गूंथ कर पराठे आदि। हां, गंगाजल का जो स्टॉक घर में था उसका इस्तेमाल जरूर हुआ, जब प्यास से रहा नही गया।

मैं तीन चार दिन रुक कर वहां से चला आया दोस्त के साथ, लेकिन वो एक अनुभव था जो अभूतपूर्व था, और एकल ही रहा जीवन का।

अनूप मुखर्जी "सागर"


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