मैं भी मनुष्य हूँ
हां, मैं भी मनुष्य हूँ,
केवल एक देह नहीं।
मानव जन्म मैने लिया,
मैं केवल मांस नहीं।
केवल एक देह नहीं।
मानव जन्म मैने लिया,
मैं केवल मांस नहीं।
सशक्त, स्वाधीन, नारी मैं,
तुम जैसा पुरुष नहीं मैं,
आहत, क्षुब्ध, अगर हूँ भी,
पराधीन नहीं, स्वाभिमानी मैं।
अकेलापन मेरे पास नहीं,
एकांत में एकात्म हूँ मैं।
एकांत में एकात्म हूँ मैं।
सहानुभूति की भिक्षुक नहीं,
दसभुजा जैसी शक्ति हूँ मैं,
कर्मकांड के बेढ़ियों में जकड़ी,
कार्य की सीमा में प्रतिबंधित,
कर्त्तव्यों ने जकढ़ी हथकड़ी,
आत्मविश्वास, स्वाधीन हूँ मैं।
युद्ध प्रारंभ नहीं करती मैं,
पर गाल मेरे दधीची समान,
अस्त्र कोई भी उठाया तुमने,
ब्रह्मास्त्र मेरा सदैव तैयार।
ईश्वर मेरा एक ही, शिव,
शिवानी मैं, तांडव में दिक्षित,
नारी हूँ, कर्मठ, हूँ मैं,
दुर्बल नहीं, सबल हूँ मैं।
मनुष्य हूँ, केवल देह नहीं मै,
मनुष्य हूँ, केवल देह नहीं मै,
अनुप मुखर्जी "सागर"

Attractive and composed beautifully.
ReplyDeleteEXCELLENT VERY VERY WELL COMPOSED.
ReplyDeleteYOUR'S THOUGHT ARE IN THE BLUE SKY.
MY BEST WISHE'S ARE ALWAYS FOR U.
GOD BLESS'S U ALWAYS