ऐ मौत, तुम हार गए
तुम छीन नही सकते
ऐ मौत, किसी को लेकर गए,
लील गए उसके शरीर को,
सुपुर्द किया अग्नि को उसको,
अहंकार, कि छीना हमसे उसको!
आज़ाद हैं हम तुम्हारे अहंकार से,
छीन नही सकते तुम हमसे उसको,
वो मेरा बेटा, भाई, बेटी, बहन,
या कोई और, स्नेहिल मुझसे बँधा।
समय नहीं था जाने का उसका,
फिर भी तुम नें रास्ता काटा,
लिया शरीर उसका, ले गए साथ,
पर छीन न सके तुम हमसे, सुनो।
बसा है हर पल की यादों में,
हर श्वास नाम लेती उसका,
शरीर नहीं तो क्या, आँखों में तो
तैरता उसका वो सुंदर चेहरा।
क्या छीनोगे उसको तुम,
गूंजे जिसकी आवाज कानों में,
हर धड़कन नाम लेकर धड़कती,
क्या छीनोगे उस नाम को हमसे।
सांसो मे बसी खुशबू उसकी,
छीन न पाओगे, तुम उसको,
मन में गड़ी जो मूर्ती उसकी,
तोड़ न पाओगे तुम उसको।
तुम हार गए, ऐ मौत,
टूटा तुम्हारा अहंकार,
ले गए शरीर तुम अपने साथ,
तोड़ न पाए सम्बंध हमसे,
स्नेह, यादें, ले न जा सके.
रहेंगे शाश्वत, हमारे साथ।
अनुप मुखर्जी "सागर"

Sundar poem with effective use of words. Keep it up dear..
ReplyDeletePoignant, and elegantly beautiful and simple!
ReplyDeleteVery good 👍 👏
ReplyDeleteBeautifully written Sir 🙏
ReplyDeleteबहुत ही मार्मिक। दिल को छूँ जाने वाली पंक्तियां।
ReplyDeleteकितनी सटीक बात कही अपने इतने सुंदर शब्दों मे । जितने भी हमारे अपने हमारे प्रिय बिछड़े हम न तो तो उनको भुला पाए न ही उनके सुंदर चेहरों को।
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