खामोश असहिष्णुता

 


असहिष्णु कहते है वो हमें, क्यों
हमारे तर्क उनको हजम नही होते।
खामोशी हमारी उनको पसंद
मान लेते इसको वो उनकी गुलामी।
गर कहीं हम बोल उठे,

होंठ हमारे अगर खोल दिए,
दिल में उनका हमेशा भयभीत, 
कांपता, हारने का खौफ सताता,
इल्जाम लगाते, वो हम पर, चीखते,
कि हम में बुर्जुआ और नाज़ी बसे।

हम तो केवल आईना दिखाते उनको
चेहरा वो देख आईना भी तोड़ देते।

हम तो चले जा रहे थे किनारे किनारे
न तूफान का डर, शिकवा भी किससे।
शमशीर चमकाते झलकाते वो हमेशा मिले
फकीरों से भी डरते, झोले में छुरी न मिले।

होठों पर हम जपते नाम हरी का,
या खुदा का, या फिर उस अनाम का।
उनके लाठियां गालियां बरसती रही,
जीत कर भी वो, गले में हार लेकर चलते रहे।

हमारी खामोशी से वो डरते रहे,
असहिष्नणु वो बनते रहे, कहते रहे।

अनुप मुखर्जी "सागर"


4 comments:

  1. असहिष्णुता, जीत कर भी वो गले में हार लेकर चलते रहे, क्या बात है। सम्मोहित कर दिया।

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  2. Nicely composed showing them the mirror.

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