न जा पाओगे कहीं

 न जा पाओगे कहीं



क्या सच्ची तुम हाथ छुड़ाकर
जाओगे दूर कहीं हमसे.
या हाथ, दोनो फैलाकर, 
आलिंगनबद्ध कर हमें,
छायाहीन, निर्मल, निर्लिप्त,
स्नेह, प्यार  का उपहार लिए,
हमारे मन में सदा रहोगे।

ईंट की इस भवन के दीवारों पर,
शोभित होगी तुम्हारी तस्वीर, 
पड़ेंगे नहीं इस फर्श पर, 
तुम्हारे चरण अब शायद कभी,
खोलोगे नहीं सन्ध्या के बंद द्वार।

तब भी रहेगा तुम्हारा अस्तित्व,
तुम्हारी स्मृति हर क्षण, हर कण में,
फूलों के सुगन्ध में तैरेगी दिशाओं में,
सुवासित, सुमधुर वचन तुम्हारे,
ध्वनित होगी हवाओं में केवल,
केवल, शांत, शुभ्र, शब्द तुम्हारे। 

अनुप मुखर्जी "सागर"


1 comment:

  1. मर्म स्पर्शी,स्व अनुभव

    ReplyDelete