कल कल बढ़ता जाता हूँ

 




"आज" वही कल है,
जिस कल की फिक्र, तुम्हें कल थी..!

काल (समय) तो कलकल बहता
हम सब को यह कहता
कल जो आज था
आज वो कल हो गया
आज जो कल है
वो कल आज हो जाएगा
और आज भी कल हो जाएगा।

तभी तो जनाब कहता हूँ 
कोशिश हमेशा करता हूँ,
समयजी का सम्मान करता हूँ
इसकी कलकल धारा के साथ
बहने की कोशिश करता हूँ।

चट्टानें जो आती राह में
उनसे भिड़ जाता हूं
चट्टानों की भीड़ से भी
टकरा जाता हूं।
हर कल को आज बनाता हुआ
हर आज को कल में बदलता

मैं नदी सम बहता जाता हूं
 मैं नित्य बढ़ता जाता हूं।

खुद को भी कभी महसूस
कर लिया करता हूं।
खुद के अंतर्व्यथा को
बहती धारा में अक्सर
धो लिया करता हूं।

मन की ज्वालामुखी से
उभरते रक्तिम सैलाब को
उगते सूरज की रक्तिम आभा
और नए दिन का उजाला
बना लिया करता हूं।

मैं निरन्तर बड़ता जाता हूं,
पथ पर आगे बढ़ता जाता हूं।

अनुप मुखर्जी "सागर"

1 comment:

  1. Nicely written. The expression of thoughts is commendable.

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