माँ का हाथ।
तुम्हारा ही हाथ है माँ
जो मेरा अटूट भरोसा है।
मैं तो उस तिनके के समान हूँ
जो आंधी में उड़कर आई हो।
मैं तो लहरों पर बहती
किसी टूटी हुई नैया सी हूँ।
मैं तो बारिश की उस गुमनाम
पानी की बूंद की तरह हूँ।
मैं ईश्वर की कृति हूँ,
उसकी ही रचना हूँ,
फिर भी मैं अजन्मी थी,
अनुपस्थित और अनदेखी था,
जैसे उस ईश्वर की ही
कोई एक प्रतिलिपि थी।
तुम्हारी दुनिया में आकर
माँ, मुझे मेरी पहचान मिली।
तुम्हारे ही भीतर माँ,
मैंने ईश्वर के दर्शन किए।
तुम्हारा ही हाथ थामकर माँ
मैं इस संसार से परिचित हुई।
ईश्वर ने जहाँ मुझे छोड़ दिया था,
वहीँ तुमने मुझे गोद में उठाया
अपने दोनों हाथों से
तुमने मुझे संभाला।
उन दोनों हाथों पर भरोसा कर,
तुम्हारे उन्हीं हाथों को थामे हुए,
मैं बड़ी होऊँगी, पहचान बनाऊँगी।
थामे रहो मेरी ये
नन्हीं-नन्हीं उंगलियां,
दिखा दो मुझे ये दुनिया
करा दो अपनी इस धरती से परिचय।
तुम्हारे बिना तो कोई आसरा नहीं,
ओ माँ, मेरी प्यारी माँ।
भरोसा और भला कहाँ है माँ?
वो भरोसा तो बस तुम्हारे ही हाथों में है,
मेरी प्यारी माँ।
— अनूप मुखर्जी "सागर"
No comments:
Post a Comment